Friday, 13 May 2016

मिथिला मखान...

वैधानिक चेतावनी~ मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूं।

फिल्म ~ मिथिला मखान, भाषा ~ मैथिली, अवधि ~ १३० मिनट।

पिछले सप्ताह अखबार पढ़ रहा था तो देखा कि भारत सरकार ५ से १७ तारीख तक दिल्ली के सिरिफोर्ट सभागार में ६३वां राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने जा रही है। उस लिस्ट में मैंने मैथिली फिल्म 'मिथिला मखान' का नाम भी देखा। जिसे पिछले दिनों ही राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है। मैंने फौरन अखबार के उस पृष्ठ की फोटो खैंची और अपने फोन के कैलेंडर में अलार्म भी सेट कर लिया ताकि कोई बहाना ना बचे और फिल्म जरूर देखूं। कल सुबह जब लगभग ८ बजे मैंने अपने ग्रामीण, मैथिली लेखक मित्र Mukund को फोनकर उन्हें सूचना दी। उन्होंने कहा कि मुझे कुछ जरूरी काम है इसलिए नहीं आ सकता। हलांकि ३-४ दिन पहले मैंने अपने दो और मित्रों को सूचित किया था लेकिन अपनी व्यक्तिगत कार्य की वजह से वो भी नहीं आ पाए। मैं बचपन से समयनिष्ठ रहा हूं। मेरे रंगमंच के गुरू Sanjay Choudhary तो हमेशा कहते हैं जीवन में ५ बजे को हमेशा ४:५५ ही समझो। तो भैया समय से मैं लगभग १५ मिनट पहले ही सभागार में जाकर बैठ गया। जल्दी पहुंचने वालों में मैं पांचवा व्यक्ति था, चार लोग मुझसे पहले बैठकर फिल्म शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। मैने तुरंत ही अपना फोन साइलेंट मोड में डालकर रख दिया। ठीक ११ बजे एक संक्षिप्त उद्घोषणा हुई और फिल्म शुरू हो गई

अब थोड़ा फिल्म के बारे में :-

सबसे पहले साधुवाद उस व्यक्ति को जिसने इस फिल्म के बारे में पहली बार सोचा, ओर इसकी पटकथा लिखी। उसके बाद फिल्म के निर्देशक Nitin Chandra से लेकर फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति निर्माता, सभी अभिनेता एवं स्पॉट ब्वाय तक को बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं। एक मैथिल दर्शक के दृष्टि से मिथिला मखान फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी। फिल्म की कहानी कनाडा से शुरू होती है। फिल्म का नायक क्रांति प्रकाश कनाडा में रहता है। वो लगभग २५ साल बाद मिथिला के अपने गांव आता है। (उसके परिवार में सिर्फ चार लोग हैं। क्रांति, उसकी मां, उसके मामा और गांव में उसके घर - बार को देखनेवाले उसके चाचा समान - किशुन जी, उसकी मां गांव छोड़कर पटना में रहती है।) गांव आते ही वो अपने दालान को छूते हुए आंगन जाता है और अपनी मां से पुछता है कि ये वही बरामदा है ना जिसपे मैं बचपन में खेल-कूद करता था। वो घर के हर एक कमरे में जाता है। एक कमरा बंद होता है। वो फौरन मां से पुछता है कि इसमें ताला क्यों लगा हुआ है, मां कहती है वो कमरा कभी नहीं खुलता है। मां बातों को घुमाती है वो समझ जाता है कि शायद मां कुछ छिपा रही है। वो किशुन जी से कहता है कि कल मुुझे आपके साथ पूरा गांव घुमना है। वो पुरा गांव, खेत - पथार, पोखर सब घुम-फिर कर आता है। दोपहर के समय घर में मां और मामा सो रहे होते हैं। किशुन जी चुपचाप ताला खोलकर क्रांति को उस कमरे में ले जाते हैं और बताते हैं कि कमरा तुम्हारे दादा जी का है। वो कमरे में घुसते ही इशारा करता है ये क्या है? किशुन जी बताते हैं इससे मखान निकाला जाता है। फिर उसे मिथिला मखान प्रा. लि. लिखा हुआ एक लकड़ी का नेम प्लेट मिलता है, वो पुछ बैठता है। किशुन जी बताने लगते है कि तुम्हारे दादा जी का मखान का बहुत बड़ा व्यव्साय था। उसकी मां उठ जाती है, खूब डांटती है और उसे अपने दादाजी और उनकी हत्या के बारे कुछ भी नहीं बताना चाहती है। वह जिद पर अड़ जाता है। कुछ समय बाद उसकी मां बताती है कि तुम्हारे दादा जी की हत्या हुई थी। इसी बीच उसकी मुलाकात फिल्म की नायिका मैथिली (अनुरिता झा) से होती है। मैथिली क्रांति को बताता है कि मैंने पहले ही ठान लिया था कि पटना से अपनी पढाई पूरी करने के बाद गांव आकर ही रहना है और मिथिला पेंटिंग एवं कला के क्षेत्र में काम करना है। वो कहती है यहां रहने और कुछ करने के लिए हिम्मत चाहिए। क्रांति को ये बात भीतर से कचोटती है। अनुरिता झा नें भी अच्छा अभिनय किया है। क्रांति की ४ दिन की छुट्टी खत्म होने को है उसे वापस कनाडा लौटना है। क्रांति मुंबई ऐयरपोर्ट पहुंचता है। आते समय मैथिली की दी हुई मधुबनी पेंटिंग को निकालकर निहारने लगता है। बीच - बीच में उद्घोषणा होती है कि हांगकांग के रास्ते कनाडा जाने वाली फ्लाइट थोड़ी देर बाद टेक ऑफ होने वाली है। क्रांति को फ्लाट छुटने की कोई फिक्र नहीं होती है। गांव में बिताए गए चार दिन का दृश्य बारी - बारी से उसके आंखो के सामने आने लगते हैं। क्रांति किशुन जी को फोन करता है और कहता है मैं वापस गांव आ रहा हूं। मुझे मिथिला मखान प्रा. लि. फिर से खोलना है साथ ही ये भी कहता है कि ये बात मां को नहीं पता चलना चाहिए। वो वापस गांव आ जाता है। काम शुरू कर देता है। इस काम में उसके साथ गांव के मुखिया शकील अहमद का भी सहयोग मिलता है। इसी बीच साथ उठते बैठते उसे मैथिली से भी प्यार हो जाता है। उसकी मुलाकात फिल्म के विलेन और बाहुबली मखान कारोबारी ब्रंम्हा सिंह (पंकज झा) से होती है। ब्रंम्हा सिंह, क्रांति को कारोबार में मदद करने का आश्वासन देता है। लेकिन वो ठीक इसके उलट करता है। क्रांति के मखान वाले घर में आगजनी करवा देता है। क्रांति बुरी तरह टूट जाता है। वो सब कुछ छोड़कर वापस कनाडा चला जाता है। फिर कुछ ऐसा होता है कि क्रांति वापस अपने गांव आता है और वहीं का होकर रह जाता है। पंकज जा विलेन के रूप में गजब ढा रहे हैं। उनका काला चश्मा, बीच - बीच में मैथिली के साथ हिंदी अौर अंग्रेजी को मिला के बोलना बेहद अच्छा लगा। पंकज बेहद मंझे हुए अभिनेता हैं वो अनुराग कश्यप ती ३-४ फिल्मों में अभिनय कर चुके है। किशुन जी, मामा और मां तीनों ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया। मुझे किशुन जी की शैली और उनका अंदाज ज्यादा अच्छा लगा। तीनों रंगमंच के पुराने खिलाड़ी से लगे। फिल्म के सभी गानें भी अच्छे है। गानों को बेहद खूबसूरती से कम्पोज और गाया गया है। निकलते समय आप गुनगुनाते हुए थियेटर से निकलेंगे। विद्यापति का बेहद प्यारा गीत सुनू सुनू रसिया को उदित नारायण ने खुबसूरत अंदाज मे गाया है। फिल्म बहुत कुछ कहती है वो आप देखेंगे तभी महसूस करेंगे। हलांकि मेरी अपेक्षा इस फिल्म को लेकर और ज्यादा थी। मसलन फिल्म का नायक चापाकल पे नहायेगा, वो गमछा पहने दिखेगा, वो खेत जाएगा तो हल या आज के समय में ट्रैक्टर से खेत भी जोतेगा, वो गाय या भैंस को खाना खिलाएगा। इस तरह का दृश्य मुझे पुरे फिल्म में नहीं दिखा। हलांकि अंत में वो मखान निकालने पोखर में खुद जाता है और बेहद खूबसूरती से मखान निकालता भी है। फिल्म में एक डायलॉग है जो नायक खलनायक से कहता है कि तुम लोग 'कुइयां के मेंढक' हो, इसे मेरे ख्याल में 'इनारक बेंग' बोला जाता तो और सुंदर लगता। फिल्म के बीच में विद्यापति के ऊपर एक नाटक दिखाया जाता है। मेरे प्रिय Sagar मामा ने उसमें अपनी आवाजें दी है। उनको सुनते ही मैंने पहचान लिया। नाटक में Ujjwal Raj ने अच्छा अभिनय किया है। उज्जवल बहुत ही जोशीला अभिनेता है। अभी कुछ महीने पहले ही मैंने उसको एक नाटक में देखा था। ये लड़का एक दिन बहुत आगे जाएगा। मेरा सभी मैथिली, भोजपुरी और हिंदी जगत के फिल्म दर्शकों से अनुरोध है कि जब ये फिल्म रिलीज हो तो एक बार थियेटर में जाकर इसे अवश्य देखें। आप हमारे खुबसूरत मिथिला, वहां के लोग, वहां के खानपान, बोली और भी बहुत यारी बाचों से रूबरू होंगे। अंत में फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों को फिर से बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

[डिस्क्लेमर ~ मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूं। बस मैंने एक दर्शक के नाते जो देखा समझा वो लिख दिया। उम्मीद है लोग पसंद करेंगे। कुछ गतल लिखा हो तो मुआफ कर दीजिएगा।] :)